समझिएपरमाणु नीति
'पहले इस्तेमाल नहीं' की नीति समझिए: भारत का परमाणु वादा क्या कहता है, और वह संधि क्यों चाहता है
इस हफ्ते भारत ने संयुक्त राष्ट्र की निरस्त्रीकरण समिति से कहा कि वह परमाणु हथियारों से कभी पहले हमला न करने के अपने वादे को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने को तैयार है। 2003 का सिद्धांत क्या कहता है, उसके अपवाद क्या हैं, हमले का आदेश कौन दे सकता है, और वैश्विक समझौते से क्या बदलेगा।
संक्षेप में
'पहले इस्तेमाल नहीं' (नो फर्स्ट यूज़) का मतलब है कि भारत परमाणु हथियारों का इस्तेमाल सिर्फ अपनी ज़मीन या कहीं भी अपनी सेनाओं पर परमाणु हमले के जवाब में करेगा। 4 जनवरी 2003 को सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने यह नीति सार्वजनिक की थी। इसमें परमाणु हथियार न रखने वाले देशों के खिलाफ इस्तेमाल से भी इनकार है, एक अपवाद के साथ: बड़े जैविक या रासायनिक हमले के जवाब में भारत परमाणु विकल्प रखता है। इस्तेमाल की मंज़ूरी सिर्फ प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली परमाणु कमान प्राधिकरण की राजनीतिक परिषद दे सकती है। इस हफ्ते भारत ने इस वादे को बाध्यकारी बहुपक्षीय समझौते में बदलने की पेशकश दोहराई।
इस हफ्ते भारत ने संयुक्त राष्ट्र में क्या कहा?
कि वह ‘पहले इस्तेमाल नहीं’ के अपने वादे को कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौते में बदलने को तैयार है।
निरस्त्रीकरण से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली समिति में भारत की ओर से बोलते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि भारत ‘पहले इस्तेमाल नहीं’ की अपनी प्रतिबद्धता और गैर-परमाणु देशों के खिलाफ परमाणु हथियार इस्तेमाल न करने के वादे, दोनों को एक बहुपक्षीय कानूनी व्यवस्था का हिस्सा बनाने को तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सैन्य कमान प्रणालियों में आ रही है, परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के फैसले इंसानी नियंत्रण में ही रहने चाहिए।
यह पेशकश नई नहीं है। यह परमाणु हथियारों पर भारत के रुख के सबसे पुराने स्तंभों में से एक को दोहराती है। इसकी बुनियाद दो दशक से ज़्यादा पुराना एक छोटा सा आधिकारिक बयान है।
‘पहले इस्तेमाल नहीं’ का मतलब क्या है?
कि भारत किसी संघर्ष में कभी पहले परमाणु हथियार इस्तेमाल नहीं करेगा, और उनका इस्तेमाल सिर्फ परमाणु हमले के जवाब में करेगा।
यह नीति तब तय हुई जब सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने भारत के परमाणु सिद्धांत की समीक्षा की और 4 जनवरी 2003 को उसकी मुख्य बातें सार्वजनिक कीं। इसके मुताबिक परमाणु हथियारों का इस्तेमाल सिर्फ भारतीय ज़मीन पर या कहीं भी भारतीय सेनाओं पर परमाणु हमले के जवाब में होगा।
यही बयान जवाब का पैमाना भी तय करता है। पहले हमले का जवाब “भारी” होगा, जिसका मकसद अस्वीकार्य नुकसान पहुंचाना होगा। ‘पहले इस्तेमाल नहीं’ को एक ऐसी धमकी के साथ जोड़ा गया है जो इतनी बड़ी हो कि भारत पर पहला हमला सोचा भी न जा सके।
विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध क्या है?
यह विचार कि भारत को बस उतने परमाणु हथियार चाहिए जितने से यह धमकी भरोसेमंद लगे, बड़ी ताकतों की बराबरी वाला ज़खीरा नहीं।
2003 के सिद्धांत का यह पहला बिंदु है। भारत की सेनाएं हमला झेलकर जवाब देने लायक होनी चाहिए, लेकिन सिद्धांत देश को हथियारों की होड़ में नहीं बांधता। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र में भारत के बयान ‘पहले इस्तेमाल नहीं’ को सार्वभौमिक, गैर-भेदभावपूर्ण और सत्यापन योग्य निरस्त्रीकरण की मांग के साथ जोड़ते हैं।
जनवरी 2003 में घोषित भारत का परमाणु सिद्धांत
- पहले इस्तेमाल नहीं सिर्फ जवाबीपरमाणु हथियार सिर्फ भारत या कहीं भी भारतीय सेनाओं पर परमाणु हमले के जवाब में।
- भारी जवाब का पैमानापहले हमले का जवाब अस्वीकार्य नुकसान पहुंचाने के लिए होगा।
- इस्तेमाल नहीं गैर-परमाणु देशों परजिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं, उनके खिलाफ परमाणु इस्तेमाल नहीं।
- प्रधानमंत्री फैसला कौन करेगासिर्फ परमाणु कमान प्राधिकरण की राजनीतिक परिषद इस्तेमाल की मंज़ूरी दे सकती है।
क्या कोई अपवाद है?
एक अहम अपवाद है: बड़े जैविक या रासायनिक हथियार हमले के जवाब में भारत परमाणु विकल्प अपने पास रखता है।
सिद्धांत गैर-परमाणु देशों के खिलाफ परमाणु इस्तेमाल पर रोक लगाता है। लेकिन यह भी कहता है कि अगर भारत या कहीं भी भारतीय सेनाओं पर जैविक या रासायनिक हथियारों से बड़ा हमला होता है, तो भारत परमाणु हथियारों से जवाब देने का विकल्प रखता है।
परमाणु हमले का आदेश कौन दे सकता है?
सिर्फ नागरिक राजनीतिक नेतृत्व, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली परमाणु कमान प्राधिकरण की राजनीतिक परिषद के ज़रिए।
2003 का बयान इस प्राधिकरण के दो हिस्से बताता है। राजनीतिक परिषद “एकमात्र संस्था है जो परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे सकती है”। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अध्यक्षता वाली कार्यकारी परिषद उसे सलाह देती है और उसके निर्देश लागू करती है। सीसीएस ने भारत की सामरिक सेनाओं के प्रबंधन के लिए सामरिक बल कमान के एक कमांडर-इन-चीफ की नियुक्ति को भी मंज़ूरी दी, और वैकल्पिक कमान श्रृंखलाओं को भी, ताकि किसी भी हालत में जवाबी हमले का आदेश दिया जा सके।
तिवारी की एआई वाली बात की पृष्ठभूमि यही ढांचा है। अगर किसी मशीन को लॉन्च की सिफारिश करने या उसे शुरू करने दिया जाए, तो चुने हुए नेता से हथियार तक की कड़ी बदल जाएगी। भारत का रुख है कि यह फैसला इंसान के हाथ में ही रहना चाहिए।
सिद्धांत भारत को और किन बातों के लिए बांधता है?
परीक्षण और व्यापार पर संयम। 2003 का बयान परमाणु और मिसाइल सामग्री व तकनीक पर कड़े निर्यात नियंत्रण, विखंडनीय सामग्री कटौती संधि (एफएमसीटी) की बातचीत में भागीदारी, और परमाणु परीक्षणों पर रोक जारी रखने का वादा करता है। इस हफ्ते संयुक्त राष्ट्र में भारत ने दो पुराने प्रस्ताव भी दोहराए: परमाणु हथियारों को हाई अलर्ट से हटाना, और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल या इस्तेमाल की धमकी पर रोक लगाने वाला अंतरराष्ट्रीय समझौता।
भारत संधि क्यों चाहता है?
क्योंकि जो वादा सिर्फ भारत करता है, वह सिर्फ भारत को बांधता है।
‘पहले इस्तेमाल नहीं’ पर बहुपक्षीय समझौता हर परमाणु हथियार वाले देश से यही वादा करने और उसे कानून मानने को कहेगा। भारत का तर्क है कि इससे किसी देश को पहले अपने हथियार छोड़े बिना परमाणु युद्ध का खतरा घटेगा। ऐसी संधि का कोई मतलब तभी होगा जब दूसरी परमाणु ताकतें उस पर दस्तखत करें, और ऐसी किसी संधि पर बातचीत की घोषणा नहीं हुई है। अक्टूबर 2026 तक यह पेशकश वही है जो लंबे समय से रही है: भारत कहां खड़ा है इसका बयान, और एक न्योता जिसे दूसरों ने अभी स्वीकार नहीं किया है।
मूल दस्तावेज़
- Cabinet Committee on Security reviews progress in operationalizing India's nuclear doctrinePress Information Bureau, 4 जनवरी 2003
- India Reiterates Offer to Make Its Nuclear No-First-Use Commitment Part of a Multilateral Legal AgreementNews On AIR, 20 अक्टूबर 2026