समझिएपाकिस्तान
खैबर पख्तूनख्वा में गवर्नर शासन: अनुच्छेद 232 और 234 क्या इजाज़त देते हैं, और अदालत किन बातों पर गौर करेगी
पेशावर हाई कोर्ट मंगलवार को प्रांत पर संघीय कब्ज़े के खिलाफ पहली चुनौती पर सुनवाई करेगा। पाकिस्तान का संविधान इस्लामाबाद को किसी प्रांत को चलाने की इजाज़त कैसे देता है, यह कितने समय चल सकता है, और भारत के राष्ट्रपति शासन से इसकी तुलना।
संक्षेप में
11 अक्टूबर को राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने खैबर पख्तूनख्वा में अनुच्छेद 232 के तहत आपातकाल और अनुच्छेद 234 के तहत गवर्नर शासन लगाया, मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी की सरकार हटा दी और प्रांतीय विधानसभा के कानून बनाने के अधिकार संसद को सौंप दिए। अनुच्छेद 234 राष्ट्रपति को तब कदम उठाने देता है जब किसी प्रांत की सरकार संविधान के अनुसार न चल सके। इस घोषणा को संसद की संयुक्त बैठक की मंज़ूरी चाहिए, जो 15 अक्टूबर को मिल गई; यह दो महीने बाद खत्म हो जाती है जब तक दोबारा मंज़ूर न हो, और छह महीने से ज़्यादा नहीं चल सकती। पीटीआई और विपक्षी गठबंधन टीटीएपी इसे असंवैधानिक बताते हैं, और पेशावर हाई कोर्ट 20 अक्टूबर को प्रारंभिक सुनवाई करेगा।
खैबर पख्तूनख्वा में क्या हुआ?
इस्लामाबाद ने प्रांत की सीधी कमान संभाल ली।
11 अक्टूबर को, जब जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थक राजधानी की ओर मार्च कर रहे थे, राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की कैबिनेट की सिफारिश मंज़ूर कर ली। उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल घोषित किया और उसे गवर्नर शासन के तहत रख दिया। खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी और उनकी कैबिनेट का पद तुरंत चला गया। प्रांतीय विधानसभा भंग नहीं हुई, लेकिन कानून बनाने का उसका अधिकार संघीय संसद के पास चला गया।
गवर्नर फैसल करीम कुंडी अब 11 सदस्यों वाली सलाहकार परिषद के साथ संघीय निर्देश पर प्रांत चला रहे हैं। उग्रवाद से सबसे ज़्यादा प्रभावित 12 ज़िलों के लिए अलग सचिवालय है, जिनमें बन्नू, बाजौर, कुर्रम और उत्तरी वज़ीरिस्तान शामिल हैं।
दोनों अनुच्छेद क्या कहते हैं?
अनुच्छेद 232 आपातकाल से जुड़ा है; अनुच्छेद 234 ऐसे प्रांत से, जिसकी सरकार संविधान के अनुसार न चल सके।
अनुच्छेद 232 राष्ट्रपति को आपातकाल घोषित करने देता है, अगर वे संतुष्ट हों कि “गंभीर आपात स्थिति” है, जिसमें “ऐसी आंतरिक अशांति जो प्रांतीय सरकार के नियंत्रण से बाहर हो” भी शामिल है। आंतरिक अशांति के मामले में प्रांतीय विधानसभा का प्रस्ताव ज़रूरी है। अगर राष्ट्रपति उसके बिना कदम उठाते हैं, तो घोषणा को दस दिन के भीतर संसद के दोनों सदनों से अलग-अलग मंज़ूरी लेनी होती है। नेशनल असेंबली और सीनेट ने 14 अक्टूबर को यह मंज़ूरी दे दी।
अनुच्छेद 234 गवर्नर शासन का प्रावधान है। राष्ट्रपति गवर्नर की रिपोर्ट पर, या संसद के दोनों सदनों के अलग-अलग प्रस्ताव पर, कदम उठा सकते हैं, अगर वे संतुष्ट हों कि “प्रांत की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती”। वे प्रांतीय सरकार के काम अपने हाथ में ले सकते हैं और घोषित कर सकते हैं कि विधानसभा के अधिकार संसद इस्तेमाल करेगी। घोषणा में आतंकवादी हमलों का हवाला देते हुए कहा गया कि मौजूदा हालात में केपी सरकार “संविधान के अनुसार काम नहीं कर सकती थी”।
यह कितने समय चल सकता है?
एक बार में दो महीने, ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने।
अनुच्छेद 234 की घोषणा संसद की संयुक्त बैठक के सामने रखी जाती है और दो महीने बाद खत्म हो जाती है, जब तक संयुक्त बैठक उसे मंज़ूर न करे। इसे दो-दो महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है, लेकिन ऐसी कोई घोषणा “किसी भी हालत में छह महीने से ज़्यादा लागू नहीं रहेगी”। संयुक्त बैठक ने 15 अक्टूबर को इसे 46 के मुकाबले 240 वोटों से मंज़ूरी दी। दोबारा न बढ़ाई गई तो यह दिसंबर के मध्य में खत्म हो जाएगी।
पाकिस्तान में गवर्नर शासन और भारत में राष्ट्रपति शासन
क्या पाकिस्तान ने पहले ऐसा किया है?
हां, लेकिन कभी-कभार। ज़रदारी ने फरवरी 2009 में पंजाब में गवर्नर शासन लगाया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ को अयोग्य ठहराया था। जनवरी 2013 में क्वेटा में हज़ारा समुदाय के दर्जनों लोगों की जान लेने वाले बम धमाकों के बाद संघीय सरकार ने अनुच्छेद 234 के तहत बलूचिस्तान की सरकार बर्खास्त की थी। दोनों बार यह थोड़े समय के लिए रहा। केपी की तरह दोनों अनुच्छेदों को साथ लगाने से केंद्र के पास आपातकालीन अधिकार और सीधा प्रशासन, दोनों एक साथ आ जाते हैं।
सरकार और उसके आलोचक क्या कहते हैं?
सरकार इसे सुरक्षा की मजबूरी बताती है; विरोधी इसे राजनीतिक कब्ज़ा।
शहबाज़ शरीफ ने शनिवार को कहा कि उनकी सरकार “चुपचाप खड़े होकर खून-खराबा होते नहीं देख सकती थी”, और अफगानिस्तान से उग्रवाद और घुसपैठ का ज़िक्र किया। पीटीआई अध्यक्ष गौहर अली खान ने पूछा है कि “अगर आतंकवाद की समस्या 12 ज़िलों में है” तो पूरे प्रांत में गवर्नर शासन क्यों लगाया गया। खैबर पख्तूनख्वा बार काउंसिल इस कदम को “असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक” बताती है, और सोमवार को पूरे प्रांत में वकील अदालतों से दूर रहे।
पेशावर हाई कोर्ट किन बातों पर गौर करेगा?
अदालत मंगलवार, 20 अक्टूबर को गौहर अली खान की याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करेगी। महमूद खान अचकज़ई के नेतृत्व वाले टीटीएपी गठबंधन की एक अलग याचिका भी घोषणा को चुनौती देती है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि प्रांतीय सरकार और विधानसभा सामान्य रूप से काम कर रही थीं और कुछ ज़िलों के सुरक्षा हालात सबको निलंबित करने का आधार नहीं थे। सरकार संसद की मंज़ूरी पर भरोसा करेगी। असली सवाल यह है कि अदालत राष्ट्रपति की इस “संतुष्टि” को कितनी दूर तक परख सकती है कि प्रांत चलाया नहीं जा सकता, और क्या बताए गए कारण चुने गए उपाय से मेल खाते हैं।
मूल दस्तावेज़
- The Constitution of the Islamic Republic of Pakistan, Part X (Emergency Provisions)pakistani.org, 19 अक्टूबर 2026