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रायहमारा मत

सीवान के बच्चे उस पटाखा इकाई में मरे जिसकी खबर अफसरों तक पहुंच चुकी थी। दिवाली से पहले हर ज़िला जांच करे

शुक्रवार को बिहार के एक घर में बन रहे पटाखों में विस्फोट से पांच लोग मारे गए, जिनमें तीन बच्चे थे। डीसा और हरदा में भी यही नाकामी दिखी थी। अवैध इकाइयों की सूचना पर जांच होनी चाहिए, अंतिम संस्कार के बाद पूछताछ नहीं।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
दिवाली पर ज़मीन पर जलता एक पटाखा (फ़ाइल फ़ोटो)
दिवाली पर ज़मीन पर जलता एक पटाखा (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Le Priyavrat / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

अलमपुर गांव में मोहम्मद अमीरुद्दीन मियां के घर में आग शुक्रवार शाम करीब 5:30 बजे लगी। अंदर बन रहे पटाखों ने आग पकड़ी और करीब दो घंटे तक फटते रहे, इतनी देर कि घर का अगला हिस्सा सड़क पर ढह गया। जब यह थमा, तो पांच लोग मर चुके थे: 65 साल के मालिक, उनकी 14 और 8 साल की दो पोतियां, पड़ोस का एक 10 साल का लड़का और एक व्यक्ति जिसकी पहचान अभी नहीं हुई।

फिर वही जाना-पहचाना सिलसिला। सीवान के पुलिस अधीक्षक ने लापरवाही के लिए थाना प्रभारी और गांव के चौकीदार को निलंबित कर दिया। एक विशेष टीम बनी। और ज़िलाधिकारी विजय प्रकाश मीणा ने एक ऐसी बात कही जो राज्य के हर अफसर को परेशान करनी चाहिए: प्रशासन को सूचना मिली थी कि उस घर में पटाखे बनाए जा रहे थे।

हादसा नहीं, एक ढर्रा

सीवान एक लंबी सूची का ताज़ा नाम है। पिछले साल अप्रैल में गुजरात के डीसा के पास एक पटाखा गोदाम में विस्फोट से 21 लोग मारे गए, सभी मध्य प्रदेश के हरदा और देवास के मज़दूर और उनके परिवार। गोदाम का लाइसेंस सिर्फ भंडारण का था, वह 31 दिसंबर 2024 को खत्म हो चुका था, और उसका नवीनीकरण इसलिए रोका गया था कि इकाई में ज़रूरी सुविधाएं नहीं थीं। फिर भी वह चलता रहा। पुलिस ने कहा कि वहां अवैध रूप से पटाखे जमा किए जा रहे थे। उसी पखवाड़े पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में घर में चल रही एक इकाई में एक ही परिवार के आठ लोग मरे, और आंध्र प्रदेश के अनकापल्ली में आठ और, जहां एक इकाई ने तय सीमा से कहीं ज़्यादा कच्चा माल जमा कर रखा था। फरवरी 2024 में खुद हरदा की एक फैक्ट्री में विस्फोट से 13 लोग मारे गए थे।

हर मामले में इकाई की खबर किसी न किसी को थी: लाइसेंस दफ्तर, थाना, पड़ोसी। कमी इस बात की थी कि विस्फोट से पहले कार्रवाई करना किसी की जवाबदेही नहीं थी।

वाजिब आपत्ति

यहां रोज़ी-रोटी का सवाल है, और बड़ा है। अकेला शिवकाशी भारत के करीब 90% पटाखे बनाता है, और इस धंधे में ऐसे गरीब मज़दूर लगे हैं जो दिन के ₹300 तक कमाते हैं। दिवाली से पहले की सख्ती छोटे निर्माताओं को छिपकर घरों और पिछले कमरों में काम करने पर मजबूर कर सकती है, जहां हालात और बुरे होते हैं। नियामक, पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पेसो), के पास करीब 3.7 लाख खतरनाक इकाइयों की निगरानी के लिए 137 स्वीकृत पदों के मुकाबले 106 अफसर बताए गए थे। सब कुछ कोई नहीं जांच सकता।

यह सही चीज़ों की जांच का तर्क है, कुछ भी न जांचने का नहीं। सीवान को किसी राष्ट्रीय सर्वेक्षण की ज़रूरत नहीं थी। उसे एक ऐसे थाने की ज़रूरत थी जो उसे बताई गई बात पर कार्रवाई करता।

दिवाली से पहले क्या हो

पहला, बिहार और उन सभी राज्यों के हर ज़िले में, जहां पटाखे बनते या जमा होते हैं, अगले दो हफ्तों में जांच अभियान चले, और लाइसेंसशुदा निर्माण व भंडारण इकाइयों की सूची जारी हो, जिसमें लिखा हो कि किसे क्या करने का लाइसेंस है। जो सूची में नहीं, वह अवैध है, और लोग उसकी शिकायत कर सकें।

दूसरा, अवैध निर्माण की हर सूचना दर्ज हो और कुछ दिनों के भीतर लिखित जवाब मिले, एक नामित अफसर की ज़िम्मेदारी के साथ। फाइल में पड़ी सूचना ही वह रास्ता है जिससे बच्चे मलबे के नीचे पहुंचते हैं।

तीसरा, खत्म या खारिज हुए लाइसेंस का मतलब परिसर को सील करना हो, उसे डीसा की तरह चलते रहने देना नहीं।

चौथा, जिस घर में बच्चे रहते हैं, उसके अंदर विस्फोटक बनाने पर जान खतरे में डालने का मुकदमा चले, उसी गंभीरता से जैसे उन पर किसी और खतरे पर।

आखिर में, केंद्र पेसो के खाली पद भरे और राज्य ज़िला अग्निशमन सेवाओं को छोटी इकाइयों की जांच का अधिकार और कर्मचारी दें, खासकर त्योहारों से पहले के हफ्तों में, जब भंडार सबसे ज़्यादा होता है।

दिवाली दो हफ्ते से कुछ ज़्यादा दूर है। तब तक भंडार बढ़ता ही जाएगा। अगले अलमपुर को ढूंढने का वक्त अभी है।

इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग

  • 5लोग, जिनमें तीन बच्चे, 23 अक्टूबर 2026 को सीवान विस्फोट में मारे गए
  • 21लोग 1 अप्रैल 2025 को गुजरात के डीसा के पास अवैध पटाखा गोदाम में मारे गए
  • 137 में 106विस्फोटक नियामक पेसो में भरे अफसर पद, 2025 की रिपोर्ट के अनुसार