रायहमारा मत
एक दिल के लिए बना कैथेटर दूसरे मरीज़ पर नहीं लगना चाहिए। स्वास्थ्य निदेशालय की चेतावनी को दांत चाहिए
डीजीएचएस का कहना है कि कुछ निजी और कॉर्पोरेट अस्पताल एक ही प्रक्रिया के लिए बने उपकरणों को स्टरलाइज़ करके दोबारा इस्तेमाल कर रहे हैं। राज्यों को चिट्ठी शुरुआत भर है। मरीज़ों को जांच, जुर्माना और यह जानने का हक चाहिए कि उन पर क्या इस्तेमाल हुआ।

एंजियोप्लास्टी के दौरान मरीज़ के दिल तक पहुंचाया जाने वाला गाइड वायर एक बार इस्तेमाल करके फेंकने के लिए बना होता है। डायलाइज़र फिल्टर, बायोप्सी सुई या सर्जरी में लगने वाला स्टेपलर भी ऐसे ही होते हैं। निर्माता ने इन्हें खोलकर, साफ करके और स्टरलाइज़ करके दोबारा इस्तेमाल के लिए नहीं बनाया, और वह गारंटी नहीं दे सकता कि दूसरी बार ये ठीक काम करेंगे या कीटाणु-मुक्त रहेंगे।
फिर भी स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) को अब हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को लिखना पड़ा है कि कुछ निजी और कॉर्पोरेट अस्पताल ठीक यही कर रहे हैं। उसने पाया कि कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, ऑन्कोलॉजी और न्यूरोसर्जरी में एक बार इस्तेमाल वाले उपकरणों और सर्जिकल सामान को दोबारा प्रोसेस करके इस्तेमाल किया जा रहा है। ये वे विभाग हैं जहां मरीज़ सबसे नाज़ुक हालत में होते हैं और इलाज सबसे महंगा। निदेशालय ने चार चिंताएं गिनाईं: मरीज़ों की सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, चिकित्सा उपकरणों के कानून का पालन, और इलाज का खर्च।
समस्या नई नहीं
नियामकों को इस पर हैरानी नहीं होनी चाहिए। 2017 में महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने पाया था कि मुंबई के एक बड़े निजी अस्पताल ने तीन महीने में 66 एंजियोप्लास्टी कैथेटर दोबारा इस्तेमाल किए, और मरीज़ों से हर एक के ₹26,000 वसूले, जबकि उनका अधिकतम खुदरा मूल्य ₹6,000 था। इसके बाद राज्य के 37 अस्पतालों के खिलाफ शिकायतें दर्ज हुईं, और सरकार ने हर उपकरण को खरीद से इस्तेमाल तक ट्रैक करने के लिए पोर्टल का वादा किया।
समस्या का असहज पहलू यही है। दोबारा इस्तेमाल आमतौर पर कमी की वजह से नहीं होता। साधन-संपन्न निजी अस्पताल में यह अक्सर मुनाफे का मामला होता है: मरीज़ नए उपकरण का पैसा देता है और उसे वह उपकरण मिलता है जो किसी और पर लग चुका है।
वाजिब आपत्ति
दूसरी ओर एक गंभीर तर्क भी है। कुछ देश सख्त, लाइसेंसशुदा शर्तों के तहत कुछ एक बार इस्तेमाल वाले उपकरणों को दोबारा प्रोसेस करने की इजाज़त देते हैं, और इससे खर्च और मेडिकल कचरा दोनों घट सकते हैं। तंग बजट वाले सरकारी अस्पताल के लिए पूरी पाबंदी विलासिता जैसी लग सकती है।
यह तर्क एक नियंत्रित व्यवस्था के पक्ष में है, उसके पक्ष में नहीं जिसका ज़िक्र निदेशालय ने किया है। सही तरीके से दोबारा प्रोसेसिंग के लिए प्रमाणित सफाई, जांच, इस्तेमाल की संख्या पर सीमा, और सबसे बढ़कर मरीज़ की जानकारी और कम बिल चाहिए। जो अस्पताल चुपचाप अपने सप्लाई विभाग में कैथेटर स्टरलाइज़ करके पूरी कीमत वसूलता है, वह इनमें से किसी कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
राज्यों को क्या करना चाहिए
पहला, जांच करें। नियमों को सख्ती से लागू करने को कहने वाली चिट्ठी का तब तक कोई मतलब नहीं जब तक औषधि नियंत्रक और स्वास्थ्य विभाग सचमुच कैथ लैब, डायलिसिस यूनिट और ऑपरेशन थिएटर जाकर स्टॉक का बिलिंग से मिलान न करें। इन जांचों के नतीजे सार्वजनिक हों।
दूसरा, अस्पतालों से हिसाब मांगें। हर प्रक्रिया के बिल में इस्तेमाल हुए उपकरणों के बैच या सीरियल नंबर दर्ज हों, ताकि मरीज़ या बीमा कंपनी देख सके कि जिसका पैसा लिया गया वह नया था। बीमा कंपनियां, सरकारी योजनाएं चलाने वाली कंपनियां भी, ऐसे दावे खारिज करें जिनका किसी उपकरण से मिलान न हो सके।
तीसरा, ऐसा दंड दें जो अस्पतालों को चुभे। मरीज़ों को रिफंड, दोबारा इस्तेमाल हुए उपकरणों की संख्या से जुड़ा जुर्माना, और बार बार ऐसा करने वालों के उस विभाग का लाइसेंस निलंबित करना किसी परिपत्र से कहीं जल्दी व्यवहार बदलेगा।
आखिर में, अगर केंद्र मानता है कि कुछ उपकरण सुरक्षित रूप से दोबारा प्रोसेस हो सकते हैं, तो वह बताए कि कौन से, किन मानकों पर और किसकी सहमति से, बजाय ऐसा धुंधला क्षेत्र छोड़ने के जिसे सबसे खराब संचालक भर दें।
ऑपरेशन टेबल पर लेटा मरीज़ नहीं जांच सकता कि उसके शरीर में क्या जा रहा है। नियम इसीलिए हैं कि उसे जांचना न पड़े। निदेशालय ने समस्या का नाम ले लिया है; अब राज्यों को दिखाना है कि उसकी चेतावनी लागू होगी।