रायहमारा मत
देवरगट्टू की लाठी लड़ाई में लगभग हर साल कोई मरता है। आंध्र इसे सिर्फ पुलिस के भरोसे न छोड़े, नियम बनाए
कुरनूल में इस साल के बन्नी उत्सव में 28 साल के एक युवक की मौत हुई और 100 से ज़्यादा लोग घायल हुए। आदेश और जागरूकता अभियान लड़ाई नहीं रोक पाए। इसे आयोजित करने वाले गांवों के साथ तय किए गए नियम इसे सुरक्षित बना सकते हैं।

हर साल दशहरे की रात हज़ारों लोग लंबी लाठियां और जलती मशालें लेकर आंध्र प्रदेश के कुरनूल ज़िले में देवरगट्टू के पहाड़ पर चढ़ते हैं। आधी रात को माला मल्लेश्वर स्वामी के विवाह के बाद आसपास के गांवों के समूह देवता की मूर्तियों के लिए भिड़ते हैं, क्योंकि मान्यता है कि मूर्तियां जिसके हाथ लगती हैं, उसके यहां समृद्धि आती है। सुबह होते-होते खून से सनी कमीज़ों में जुलूस पहाड़ से उतरता है।
इस साल अलूर का 28 साल का युवक पोटाराजू नीचे नहीं लौटा। 100 से ज़्यादा लोग घायल हुए, जिनमें करीब 10 की हालत गंभीर है। पहाड़ पर 1,000 से ज़्यादा पुलिसकर्मी तैनात थे। गांव वालों ने पुलिस के आदेशों की अनदेखी कर लड़ाई की।
एक मौत, जिसकी आशंका थी
बन्नी उत्सव पर नज़र रखने वाला कोई भी इसे अचानक हुई घटना नहीं कह सकता। पिछले साल ड्रोन, 1,000 पुलिसकर्मियों और 16 गांवों में 32 जागरूकता अभियानों के बावजूद दो लोगों की मौत हुई और 90 घायल हुए। 2023 में दो लोग तब मारे गए जब एक फेंकी गई मशाल से बचने के लिए पेड़ पर चढ़े दर्शकों के बोझ से उसकी डाल टूट गई। 2022 में कर्नाटक के एक किशोर की मौत हुई। हर साल घायलों की गिनती दर्जनों में होती है, और हर साल अधिकारी कहते हैं कि इंतज़ाम पर्याप्त थे।
प्रशासन ने सीधे पाबंदी भी आज़माई है। 2020 में, जब कोविड चरम पर था, उत्सव रद्द किया गया और निषेधाज्ञा लगाई गई। ज़िला पुलिस प्रमुख ने कहा था, “इसे रद्द कर दिया गया है।” फिर भी हज़ारों लोग पहुंचे, करीब 50 घायल हुए, और चूंकि कोई चिकित्सा शिविर नहीं लगाया गया था, उनका इलाज आम दिनों से कठिन रहा।
सबक साफ है। ज़िला मुख्यालय से घोषित पाबंदियां देवरगट्टू में काम नहीं करतीं। न ही वह भारी पुलिस बल, जो लाठियां निकलते ही पीछे हट जाता है।
एक जायज़ आपत्ति
उत्सव के समर्थकों की बात में दम है। यह लंबे समय से चली आ रही रस्म है, जिसका इसमें हिस्सा लेने वालों के लिए गहरा धार्मिक अर्थ है। प्रतिभागी पहले से उपवास और ब्रह्मचर्य का व्रत रखते हैं। ज़्यादातर वयस्क हैं जो जोखिम जानते हैं और उसे स्वीकार करते हैं, और दूर बैठकर इस प्रथा का मज़ाक उड़ाने वाले शायद ही इसे समझते हैं। जो सरकार इसे बलपूर्वक खत्म करने की कोशिश करेगी, वह हारेगी और ऊपर से अविश्वास भी बढ़ाएगी।
लेकिन सहमति पहाड़ पर मौजूद हर व्यक्ति पर लागू नहीं होती। 2023 में मारे गए दोनों लोग पेड़ के नीचे खड़े दर्शक थे। मरने वालों और घायलों में दूसरे ज़िलों और दूसरे राज्यों के लोग भी हैं। जो रस्म लगभग तय रूप से किसी की जान लेती है, वह सिर्फ उसमें हिस्सा लेने वालों का मामला नहीं रह जाती।
नियम बनाएं, दिखावा नहीं
जल्लीकट्टू को लेकर तमिलनाडु के सामने ऐसा ही सवाल था, और उसने यह मानने के बजाय कि खेल रोका जा सकता है, कानून बनाकर इसे नियमों में बांधा। आंध्र प्रदेश को देवरगट्टू में यही रास्ता अपनाना चाहिए।
पहला, ज़िला प्रशासन अगले दशहरे से काफी पहले मंदिर समिति और हिस्सा लेने वाले गांवों के बुज़ुर्गों के साथ बैठे और लिखित नियम तय करे: लाठियों के आकार की सीमा, भीड़ में मशाल फेंकने पर रोक, और जुलूस का तय रास्ता और समय।
दूसरा, दर्शकों को अलग रखा जाए। पहाड़ी पर बैरिकेड वाले दर्शक क्षेत्र हों, और देखने के लिए इस्तेमाल होने वाले पेड़ों और चट्टानी किनारों पर जाना बंद किया जाए।
तीसरा, पहाड़ की तलहटी में हर साल पूरे स्टाफ और एंबुलेंस के साथ चिकित्सा शिविर लगे, चाहे उत्सव की आधिकारिक “अनुमति” हो या न हो। लोगों को हतोत्साहित करने के लिए चिकित्सा मदद हटाना, जैसा 2020 में हुआ, सिर्फ नुकसान बढ़ाता है।
चौथा, प्रशासन हर साल मृतकों, घायलों और उठाए गए कदमों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करे, ताकि सुधार हुआ या नहीं, यह परखा जा सके।
आखिर में, हर मौत की जांच किसी भी दूसरी मौत की तरह हो। पुलिस ने अभी तक नहीं बताया है कि पोटाराजू की मौत पर कोई मामला दर्ज हुआ है या नहीं। परंपरा यह पूछना बंद करने की वजह नहीं है कि एक नौजवान की जान कैसे गई।
देवरगट्टू में आस्था बनी रहेगी। राज्य के सामने सवाल यह है कि क्या अगले साल का उत्सव इस सूची में एक और नाम जोड़कर खत्म होगा।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 1मौत और 100 से ज़्यादा घायल, 21-22 अक्टूबर 2026 की रात बन्नी उत्सव में
- 2मौतें और 90 घायल 2025 में, ड्रोन और 1,000 पुलिसकर्मियों के बावजूद
- 2020वह साल जब उत्सव आधिकारिक रूप से रद्द था, फिर भी हुआ