रायहमारा मत
पंजाब को नशे की समस्या ने बदनाम नहीं किया, ईमानदार आंकड़ों की कमी उसे निराश कर रही है
भगवंत मान कहते हैं कि नशे को लेकर राज्य को बेवजह दोष दिया गया है। सीमा और केंद्र की ज़िम्मेदारी पर उनकी बात में दम है। लेकिन खराब छवि का जवाब सबूत है, और उनकी सरकार पंजाब के अब तक के सबसे बड़े सर्वे के नतीजे दबाए बैठी है।

“नशा है नहीं इत्थे, बदनाम ही ज़्यादा कीता होया,” भगवंत मान ने शुक्रवार को फिल्लौर में अपने पुलिस अधिकारियों से कहा। यानी नशा यहां है नहीं, पंजाब को बस बदनाम किया गया है। कुछ ही घंटों में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनके मुख्य सचिव को पत्र लिखकर नशे से जुड़े तीन मामलों पर रिपोर्ट मांगी, जिनमें मानसा में नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या भी शामिल है।
मुख्यमंत्री हर बात में गलत नहीं हैं। लेकिन जिस हफ्ते झोटा की मौत हुई, उस हफ्ते यह गलत बयान था, और यह ऐसे दावे पर टिका है जिसे अभी कोई नहीं परख सकता, उनकी अपनी सरकार भी नहीं।
मान की बात में कहां दम है
नशा पंजाब में ऐसी सीमा से आता है जिसकी रखवाली राज्य नहीं करता। सीमा से लगी 50 किलोमीटर की पट्टी सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पास है, जो केंद्र के अधीन है। मान ने शुक्रवार को याद दिलाया कि गुजरात के कांडला बंदरगाह पर 3,000 किलो नशीला पदार्थ पकड़ा गया था, जो केंद्र के नियंत्रण में है, और पंजाब ने अपना एंटी-ड्रोन सिस्टम खुद के पैसे से लगाया। नशे की लत कोई पंजाबी गुण नहीं है, और राज्य को देश की नशा राजधानी मानने की कीमत चुकानी पड़ती है: इससे एक पूरी पीढ़ी पर कलंक लगता है और निवेश डरता है।
यह भी सच है कि इस कहानी में केंद्र का अपना हित है। पंजाब में 2027 की शुरुआत में चुनाव हैं, और भाजपा नशे और कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाना चाहती है।
आंकड़े क्या कहते हैं
फिर भी, जो आंकड़े मौजूद हैं वे इनकार का साथ नहीं देते। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की गिनती के सबसे ताज़ा साल 2023 में पंजाब में ओवरडोज़ से 89 मौतें दर्ज हुईं, लगातार दूसरे साल किसी भी राज्य में सबसे ज़्यादा। नशा तस्करी के मामलों की उसकी दर, प्रति लाख आबादी 25.3, भारत में सबसे ऊंची थी। राज्य की अपनी पुलिस कहती है कि मार्च 2025 से अपने अभियान में उसने 79,784 गिरफ्तारियां की हैं। जो राज्य सिर्फ बदनाम किया गया हो, वहां इतनी गिरफ्तारियां नहीं होतीं।
ये अपराध और मौत के आंकड़े हैं, लत का पैमाना नहीं, और इन्हें एक से ज़्यादा तरह से पढ़ा जा सकता है। ज़्यादा मामलों का मतलब ज़्यादा नशा भी हो सकता है, या सिर्फ ज़्यादा पुलिसिंग। ठीक इसीलिए नशे के इस्तेमाल की सही गिनती ज़रूरी है।
वह सर्वे जिसे किसी ने नहीं देखा
पंजाब के पास ऐसी गिनती है। 1 अप्रैल को मान सरकार ने करीब 65 लाख परिवारों का घरेलू नशा और सामाजिक-आर्थिक सर्वे शुरू किया, जिसके लिए ₹150 करोड़ रखे गए। मुख्यमंत्री ने कहा था कि मकसद नशे की समस्या को समझना और फिर ऐसी लक्षित नीतियां बनाना है जिनके बेहतर नतीजे हों। डेटा जुटाने का काम, जो पहले जून तक पूरा होना था, गर्मियों तक खिंचा। अधिकारियों ने कहा था कि विश्लेषण में करीब दो महीने और लगेंगे। शुरुआत के साढ़े छह महीने बाद भी कोई नतीजा सार्वजनिक नहीं हुआ है।
शुरुआत से ही चिंताएं थीं। सर्वे करने वालों ने बताया कि परिवार नशे का इस्तेमाल मानने या बेचने वालों के नाम बताने से कतरा रहे थे। शराब, जिसे सर्वे के आलोचक राज्य की सबसे आम लत बताते हैं, को बाहर रखा गया। पंजाबी यूनिवर्सिटी की एक सामाजिक कार्य प्रोफेसर ने कहा कि तरीका शोध के बुनियादी सिद्धांतों का पालन नहीं करता। ये शंकाएं तरीके और नतीजों को एक साथ प्रकाशित करने की वजह हैं, ताकि विशेषज्ञ उन्हें परख सकें, आंकड़ों को चुनाव के बाद तक दराज़ में रखने की नहीं।
पंजाब को क्या करना चाहिए
पहला, 2027 का प्रचार शुरू होने से पहले सर्वे को ज़िलेवार, उसकी प्रश्नावली, नमूने और ज्ञात कमियों के साथ पूरा जारी करे। अगर इससे पता चले कि समस्या डर से छोटी है, तो मान की दलील और मज़बूत होगी।
दूसरा, ओवरडोज़ से मौतों और नशा मुक्ति केंद्रों में भर्ती के आंकड़े हर तिमाही जारी करे, पुलिस फाइलों से नहीं, अस्पतालों के रिकॉर्ड से।
तीसरा, केंद्र भी इतनी ही पारदर्शिता दिखाए। बीएसएफ और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो पंजाब सीमा और कांडला जैसे बंदरगाहों पर हुई ज़ब्ती के आंकड़े जारी करें, ताकि कौन चूका, इस पर बहस सबूतों से तय हो।
पंजाब के परिवारों को यह सुनने की ज़रूरत नहीं कि समस्या काल्पनिक है, या सारा दोष किसी और का है। उन्हें यह जानना है कि समस्या कितनी बड़ी है, कहां सबसे गंभीर है, और जो किया जा रहा है वह काम कर रहा है या नहीं।
इस राय के पीछे की रिपोर्टिंग
- 892023 में पंजाब में ओवरडोज़ से दर्ज मौतें, किसी भी राज्य में सबसे ज़्यादा
- 25.32023 में पंजाब में प्रति लाख आबादी नशा तस्करी के मामले, भारत में सबसे ऊंची दर
- 65 लाख1 अप्रैल 2026 को शुरू हुए घरेलू नशा सर्वे में शामिल परिवार, जिसके नतीजे अभी सार्वजनिक नहीं