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रायहमारा मत

बिना मुकाबले का मानवाधिकार परिषद चुनाव, चुनाव नहीं है। भारत असली चुनाव की मांग करे

लगातार दूसरे साल संयुक्त राष्ट्र ने अपनी शीर्ष मानवाधिकार संस्था की 15 सीटें ठीक 15 उम्मीदवारों से भर दीं। ऐसी तय सूचियां सरकारों को शर्मिंदगी से बचाती हैं; साथ ही खराब रिकॉर्ड को किसी जांच से भी बचा लेती हैं।

संपादकीय डेस्क सेप्रकाशित
जिनेवा के पैले दे नासियों में मानवाधिकार परिषद का सभाकक्ष (फ़ाइल फ़ोटो)
जिनेवा के पैले दे नासियों में मानवाधिकार परिषद का सभाकक्ष (फ़ाइल फ़ोटो)Photo: Unnerving duck / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

13 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 देशों को मानवाधिकार परिषद के लिए चुना, जो संयुक्त राष्ट्र की सबसे ऊंची मानवाधिकार संस्था है। मतदान एक औपचारिकता था। हर क्षेत्रीय समूह ने ठीक उतने ही उम्मीदवार उतारे जितनी उसकी सीटें थीं, इसलिए एक भी वोट पड़ने से पहले हर उम्मीदवार की जीत तय थी। लगातार दूसरे साल ऐसा हुआ।

ह्यूमन राइट्स वॉच के संयुक्त राष्ट्र निदेशक लुई शारबोनो ने कहा, “यह बिना मुकाबले का मतदान ‘चुनाव’ शब्द का मज़ाक बनाता है।” वे सही हैं।

यह क्यों मायने रखता है

परिषद 2006 में एक बदनाम आयोग की जगह बनाई गई थी, जिसके सदस्यों में दुनिया के कुछ सबसे बड़े मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता भी थे। इलाज मतदान को माना गया था: उम्मीदवारों को गुप्त मतदान में महासभा का पूर्ण बहुमत जीतना होता है, ताकि खराब रिकॉर्ड वाले देशों को बाहर रखा जा सके। तय सूची यह इलाज ही खत्म कर देती है। जब हर सीट पर एक उम्मीदवार हो, तो महासभा चुन नहीं सकती; वह सिर्फ क्षेत्रीय समूहों की बंद कमरे में बनी सूची पर मुहर लगा सकती है।

इस साल की सूची खलनायकों की सूची नहीं थी। इसमें जापान, जर्मनी, आयरलैंड, ब्राज़ील और उरुग्वे के साथ नेपाल, घाना और यूक्रेन भी थे। पर बात यह नहीं है। जो संस्था दूसरे देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर फैसला सुनाती है, उसकी सीट मुकाबले में जीती जानी चाहिए, और हर उम्मीदवार को, रिकॉर्ड अच्छा हो या बुरा, अपनी दावेदारी साबित करनी चाहिए।

वाजिब आपत्ति

राजनयिक व्यावहारिक कारणों से तय सूचियों का बचाव करते हैं। मुकाबले वाले चुनाव महंगे और कड़वाहट भरे होते हैं, उनमें असंबंधित मुद्दों पर वोटों की सौदेबाज़ी होती है, और अभियान का खर्च न उठा पाने वाले छोटे देश पूरी तरह बाहर रह सकते हैं। क्षेत्रीय समूहों का तर्क है कि वे अपने सदस्यों को सबसे अच्छी तरह जानते हैं और आपसी सहमति से बारी-बारी का संतुलन बना रहता है।

ये असली कीमतें हैं। लेकिन महंगे चुनाव का विकल्प सस्ता चुनाव नहीं, बल्कि कोई चुनाव न होना है। और बिना मुकाबले की सीटों के लिए सबसे उत्सुक अक्सर वही देश होते हैं जो खुले मतदान में मुश्किल में पड़ते।

भारत क्या करे

भारत कई बार परिषद का सदस्य रहा है और आगे भी रहना चाहेगा। वह एक ऐसे संयुक्त राष्ट्र में सुधार की भी सही मांग करता है जहां बहुत कुछ कुछ ही देश तय करते हैं, जैसा अगले महासचिव के लिए इस महीने के गतिरोध भरे स्ट्रॉ पोल ने दिखाया। इसी के अनुरूप उसे एशिया-प्रशांत समूह में एक सीधा नियम आगे बढ़ाना चाहिए और दूसरों से भी अपनाने को कहना चाहिए: हर बार सीटों से कम से कम एक ज़्यादा उम्मीदवार।

भारत को यह भी वादा करना चाहिए कि अगली बार वह खुले मुकाबले में उतरेगा और जिन प्रतिबद्धताओं पर चुनाव लड़ रहा है उन्हें सार्वजनिक करेगा। जिस देश को अपनी लोकतांत्रिक साख पर भरोसा है, उसे असली मतदान से डरने की ज़रूरत नहीं। परिषद की, और उसमें बैठने वाले हर देश की, विश्वसनीयता इसी पर टिकी है कि सदस्य नियुक्त न हों, चुने जाएं।